अंतराराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगोष्टियां
यू.जी.सी. की एपीआई योजना के अनुपालन में अंतराराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगोष्टियों में सहभागिता करने वाले प्रबुद्धजनों की भीड़ देखते ही बनती है। एक का जाना और 10 का प्रमाण पत्र बनाकर लाने की होड़ बाकई हमें हमारी सहयोगिता एवं परस्पर सहयोग की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करती है। भले शिक्षण से जुड़े लोगों में कार्यस्थल एवं परस्पर कितना भी वैमनस्य क्यों न हो यहां सब ऐसे मिलते हुए दिखाई देते हैं जैसे मित्रता एवं संबंध का इनसे बड़ा विश्व में कोई उदाहरण है ही नहीं। सबसे ज्यादा आनंदायक पीड़ा तब होती है जब एक सहभागी सुदूर स्थान से लम्बी यात्रा कर संगोष्टि में अपने विचार प्रस्तुत करने की बारी की प्रतीक्षा करता है और उसे अध्यक्ष द्वारा कहा जाता है कि समयाभाव के कारण आपको मात्र दो मिनट का समय दिया जाता है अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए। मन अंदर से यह सोच कर प्रफुल्लित हो उठता है कि चलो अब ज्यादा बोलना नहीं पड़ेगा और प्रश्न पूछे जाने पर विचार विमर्श का प्रश्न ही नहीं उठता और वक्ता का शोध पत्र सर्वमान्य रूप से स्वीकृत माना जाएगा, भले वह स्वयं जानता है कि उसने कितना शोध कर उसे लिखा है।
यू.जी.सी. की एपीआई योजना के अनुपालन में अंतराराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगोष्टियों में सहभागिता करने वाले प्रबुद्धजनों की भीड़ देखते ही बनती है। एक का जाना और 10 का प्रमाण पत्र बनाकर लाने की होड़ बाकई हमें हमारी सहयोगिता एवं परस्पर सहयोग की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करती है। भले शिक्षण से जुड़े लोगों में कार्यस्थल एवं परस्पर कितना भी वैमनस्य क्यों न हो यहां सब ऐसे मिलते हुए दिखाई देते हैं जैसे मित्रता एवं संबंध का इनसे बड़ा विश्व में कोई उदाहरण है ही नहीं। सबसे ज्यादा आनंदायक पीड़ा तब होती है जब एक सहभागी सुदूर स्थान से लम्बी यात्रा कर संगोष्टि में अपने विचार प्रस्तुत करने की बारी की प्रतीक्षा करता है और उसे अध्यक्ष द्वारा कहा जाता है कि समयाभाव के कारण आपको मात्र दो मिनट का समय दिया जाता है अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए। मन अंदर से यह सोच कर प्रफुल्लित हो उठता है कि चलो अब ज्यादा बोलना नहीं पड़ेगा और प्रश्न पूछे जाने पर विचार विमर्श का प्रश्न ही नहीं उठता और वक्ता का शोध पत्र सर्वमान्य रूप से स्वीकृत माना जाएगा, भले वह स्वयं जानता है कि उसने कितना शोध कर उसे लिखा है।
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